आत्मीय पाठक !
भारत क्यों निशाने पर? पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।
पुस्तक को अपने हाथ में लेते हुए आनंद तो हुआ पर मन में एक जिज्ञासा हुई।
आखिर यह पुस्तक क्यों लिखा ??
यहाँ आज इसी पर थोड़ी चर्चा करूँगा…………..
जब कोई राष्ट्र अपनी सदियों पुरानी निद्रा से जागकर अंगड़ाई लेता है, जब एक प्राचीन सभ्यता अपनी खोई हुई अस्मिता को पहचानकर वैश्विक पटल पर महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होती है, तब स्थापित वैश्विक व्यवस्था की चौधराहट हिलने लगती है। आज का भारत इसी मोड़ पर खड़ा है। लेकिन इस उदय के साथ ही एक समानांतर, अदृश्य और बेहद खतरनाक युद्ध हमारे खिलाफ छेड़ दिया गया है। यह युद्ध सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि हमारे दिमागों में, हमारी न्यायपालिका में, हमारी शिक्षा व्यवस्था में, और हमारी भाषा में लड़ा जा रहा है। और इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। उन जड़ो तक पहुंचने के प्रयास में यह पहला पड़ाव है।
मैंने "भारत क्यों निशाने पर?" पुस्तक किसी तात्कालिक राजनीतिक घटनाक्रम की प्रतिक्रिया में नहीं लिखी। यह पुस्तक मेरे भीतर सुलगते उन सवालों का दस्तावेजीकरण है, जो हर उस भारतीय को मथने चाहिए जो इस देश की माटी से प्रेम करता है। यह पुस्तक सत्य की खोज यानि एक 'सत्यान्वेषण की यात्रा' है, जिसे प्रमाणों, तथ्यों और सामरिक दृष्टिकोण के साथ समाज के सामने लाना आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका था।
आइए, इस यात्रा के उन पन्नों को खोलते हैं जो यह स्पष्ट करेंगे कि आखिर यह पुस्तक क्यों लिखी गई और क्यों आज भारत वैश्विक ताकतों के निशाने पर है।
1. सत्यान्वेषण की आवश्यकता: नैरेटिव युद्ध (Narrative Warfare) का प्रतिकार
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जिसे 'सूचना का युग' कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह 'भ्रम और प्रोपेगैंडा का युग' है। यह युग विश्वासों के आभाव का युग है। आज के दौर में युद्ध केवल भौगोलिक सीमाओं को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। आज का सबसे घातक युद्ध है 'नैरेटिव वॉरफेयर' (वैचारिक युद्ध) । यदि आप किसी देश को शारीरिक रूप से नष्ट करना चाहते हैं, तो आपको सेना की आवश्यकता होगी। लेकिन यदि आप किसी देश को हमेशा के लिए पंगु बनाना चाहते हैं, तो उसके नागरिकों के मानस को विकृत कर दीजिए, उनके भीतर अपनी ही संस्कृति के प्रति हीनभावना भर दीजिए।
पिछले कुछ वर्षों से मैं लगातार देख रहा था कि कैसे वैश्विक मीडिया, अंतरराष्ट्रीय थिंक-टैंक और कुछ विशिष्ट लॉबियां मिलकर भारत की एक नकारात्मक छवि गढ़ने का सुनियोजित प्रयास कर रही हैं। चाहे भारत की न्यायपालिका का कोई निर्णय हो, हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं हों, या हमारा आंतरिक सुरक्षा ढांचा—हर चीज को एक खास चश्मे से दिखाकर भारत को 'असहिष्णु', 'अलोकतांत्रिक' और 'पिछड़ा' सिद्ध करने का खेल खेला जा रहा है।
यह पुस्तक इसलिए लिखी ताकि इस नैरेटिव युद्ध के पीछे छिपे मूल कारणों तक पंहुचा जा सके। यह पुस्तक पाठकों को एक ऐसी विश्लेषणात्मक दृष्टि (Analytical Vision) देती है, जिससे वे सोशल मीडिया पर तैरती किसी सामान्य दिखने वाली खबर या किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की रेटिंग के पीछे छिपे असली भू-राजनीतिक एजेंडे को समझ सकें। यह सतही दावों की किताब नहीं है; यह अकाट्य साक्ष्यों (Evidence) पर आधारित एक वैचारिक हथियार है। इसमें मैंने कुछ लिखा इससे अधिक मैंने जो देखा, पढ़ा, सुना उन सबको जोड़ते हुए विश्लेषणात्म शैली में पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया है। पाठक को निर्णय लेने में सहयोग करने का प्रयास किया है।
2. ईसाई मिशनरियों की रणनीतिक और सामरिक घेराबंदी
इस पुस्तक को लिखने का एक अत्यंत संवेदनशील और सामरिक (Strategic) कारण है— भारत के खिलाफ ईसाई मिशनरियों द्वारा रची गई चौतरफा घेराबंदी का पर्दाफाश करना।
आमतौर पर मतांतरण (Conversion) को एक विशुद्ध रिलिजियस या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला मानकर छोड़ दिया जाता है। लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। जब आप गहराई से भारत के मानचित्र और जनसांख्यिकी (Demography) का अध्ययन करते हैं, तो आपको समझ आता है कि यह कोई सामान्य धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि एक अत्यंत अचूक और सामरिक घेराबंदी है।
- भौगोलिक और जनसांख्यिकीय घेराबंदी: पूर्वोत्तर भारत के राज्यों की जनसांख्यिकी में आया बदलाव, दक्षिण भारत के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण तटीय इलाके, और मध्य भारत के खनिज-संपन्न आदिवासी क्षेत्रों (Red Corridor और उसके आस-पास) में मिशनरी गतिविधियों का जाल कोई संयोग नहीं है। यह एक सोची-समझी भू-राजनीतिक चाल है, जिसके तहत भारत के संवेदनशील हिस्सों में एक ऐसा जनसांख्यिकीय पॉकेट तैयार किया जा रहा है, जिसे भविष्य में दिल्ली की सत्ता के खिलाफ एक दबाव समूह (Pressure Group) या अलगाववादी आंदोलन के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। जलता मणिपुर एक केस स्टडी हो सकता है। इस पर आगे भी लिखा जायेगा।
- फंडिंग का अंतरराष्ट्रीय संजाल: विदेशी एनजीओ (NGOs) और चैरिटी के नाम पर भारत में आने वाले अरबों रुपयों का इस्तेमाल केवल स्कूल या अस्पताल बनाने में नहीं होता। यह पैसा भारत के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने, स्थानीय स्तर पर जातीय संघर्ष पैदा करने, और विकास परियोजनाओं (जैसे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र या थूथुकुडी स्टर्लाइट कॉपर प्लांट के खिलाफ हुए प्रदर्शन) को रुकवाने के लिए आंदोलनों को फंड करने में किया जाता है।
मैंने इस पुस्तक में प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि कैसे यह मिशनरी तंत्र एक समानांतर व्यवस्था चला रहा है, जिसका अंतिम उद्देश्य भारत की संप्रभुता को आंतरिक रूप से कमजोर करना है।
3. भारतीय मानस (Indian Psyche) को बदलने का औपनिवेशिक तंत्र
मिशनरियों और औपनिवेशिक ताकतों की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि उन्होंने केवल हमारे शरीर या जमीनों पर कब्जा नहीं किया, बल्कि उन्होंने 'भारतीय मानस' (Indian Psyche) को ही बदल दिया। उन्होंने हमारे सोचने का तरीका, हमारी आदतें और हमारी प्राथमिकताओं को नियंत्रित करना शुरू कर दिया। इस कार्य के लिए उन्होंने हमारे समाज के सबसे बुनियादी स्तंभों पर प्रहार किया:
क) शिक्षा प्रणाली (Education System) का विकृतीकरण
लॉर्ड मैकाले ने जब भारत की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था (गुरुकुल पद्धति) को नष्ट कर अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखी थी, तो उसका उद्देश्य स्पष्ट था—ऐसे भारतीयों का निर्माण करना जो रंग-रूप में तो भारतीय हों, लेकिन बुद्धि, विचार और स्वाद में अंग्रेज हों। आज के कॉन्वेंट और मिशनरी स्कूल इसी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। इन संस्थानों में हमारे बच्चों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि उनकी अपनी परंपराएं 'अंधविश्वास' हैं, उनके त्योहार 'प्रदूषण फैलाने वाले' हैं, और उनकी भाषा 'गंवारू' है। इसके विपरीत, पश्चिमी जीवनशैली और संस्कृति को 'प्रगतिशील' और 'आधुनिक' मानकर परोसा जाता है। परिणाम यह है कि हमारी नई पीढ़ी अपनी ही जड़ों से कटकर वैचारिक रूप से अनाथ हो रही है।
ख) न्यायपालिका (Judiciary) का औपनिवेशिक चश्मा
हमारी न्यायपालिका आज भी उसी औपनिवेशिक कानून और चेतना के बोझ तले दबी है जो अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाए रखने के लिए बनाई थी। कई बार हमारे न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले निर्णयों या टिप्पणियों में यह साफ झलकता है कि वे भारत की मूल सांस्कृतिक आत्मा, हमारे संतों की परंपराओं और हमारे लोक-आचार को पश्चिमी लिबरल (Liberal) चश्मे से देखते हैं। जब सबरीमाला जैसे संवेदनशील पारंपरिक विषयों पर या हमारे त्योहारों के तौर-तरीकों पर न्यायालय पश्चिमी आधुनिकता के पैमाने थोपने लगते हैं, तो वह भारतीय मानस पर एक गहरा आघात होता है।
ग) सामाजिक आदतें और भाषा (Social Habits & Language)
किसी समाज को नष्ट करने का सबसे सरल उपाय है उसकी भाषा को छीन लेना। अंग्रेजी को 'एलीट' (Elite) और सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया गया, जिससे हमारी समृद्ध क्षेत्रीय भाषाएं और संस्कृत हाशिए पर चले गए। इसके साथ ही, हमारी दैनिक जीवनशैली, खान-पान और सामाजिक आदतों को इस तरह बदला गया कि हम एक उपभोक्तावादी (Consumerist) समाज बन जाएं, जो अपनी हर जरूरत के लिए पश्चिम की ओर देखे।
मैंने यह पुस्तक इसलिए लिखी ताकि हम समझ सकें कि कैसे हम अनजाने में उसी तंत्र के गुलाम बने हुए हैं जो हमें मानसिक रूप से नियंत्रित कर रहा है।
4. गौरवशाली इतिहास, सभ्यता और संस्कृति के प्रति हीनभावना
एक प्रसिद्ध सूक्ति है— "यदि किसी राष्ट्र को नष्ट करना हो, तो सबसे पहले उसके इतिहास को नष्ट कर दो।" भारत के मामले में यही किया गया। हमारे इतिहास को इस तरह से विकृत किया गया कि एक आम भारतीय अपने पूर्वजों के नाम पर गौरवान्वित होने के बजाय शर्मिंदा होने लगे।
वामपंथी और औपनिवेशिक इतिहासकारों के एक गठजोड़ ने दशकों तक हमारे पाठ्यपुस्तकों को नियंत्रित किया। उन्होंने हमें क्या पढ़ाया? हमें पढ़ाया गया कि भारत हमेशा से आक्रांताओं द्वारा रौंदा जाने वाला एक कमजोर देश था। हमें मुगलों और अंग्रेजों के वैभव की कहानियां तो विस्तार से पढ़ाई गईं, लेकिन चोल साम्राज्य के नौसैनिक चमत्कार, विजयनगर साम्राज्य की भव्यता, अहोम राजवंश के लाचित बोरफुकन का पराक्रम, या छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप का रणनीतिक कौशल इतिहास के पन्नों में समेट दिया गया।
हमारी महान वैज्ञानिक खोजों—जैसे सुश्रुत की शल्यचिकित्सा, आर्यभट और भास्कर का गणित, कणाद का परमाणु सिद्धांत—को 'मिथक' या 'काल्पनिक' कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया। हमारी सभ्यता, जो 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' के शाश्वत सिद्धांतों पर टिकी है, उसे 'जातिवादी' और 'दमनकारी' सिद्ध करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक सेमिनार (Academic Seminars) आयोजित किए जाते हैं।
मैंने "भारत क्यों निशाने पर?" में इन ऐतिहासिक मिथकों को तथ्यों के साथ तोड़ा है। यह पुस्तक हमारे गौरवशाली इतिहास और परंपराओं के प्रति दृष्टिकोण को बदलने का एक ईमानदार प्रयास है, ताकि आने वाली पीढ़ी हीनभावना से मुक्त होकर सीना तानकर कह सके कि हम दुनिया की सबसे प्राचीन और जीवंत सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं।
5. हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) की विभीषिका
आज भारत जिस खतरे का सामना कर रहा है, उसे रक्षा विज्ञान की भाषा में 'हाइब्रिड वॉरफेयर' (मिश्रित युद्ध) कहा जाता है। इसमें कोई घोषित युद्ध नहीं होता। इसमें सेनाएं आमने-सामने नहीं आतीं। इसमें हथियारों की जगह निम्नलिखित टूल्स का उपयोग किया जाता है:
- टूलकिट गैंग्स और प्रोपेगैंडा नेटवर्क: जब भी देश में कोई बड़ा सुधार लागू किया जाता है (जैसे सीएए, कृषि कानून या नई शिक्षा नीति), अचानक वैश्विक स्तर पर एक 'टूलकिट' सक्रिय हो जाती है। ग्रेटा थनबर्ग से लेकर मिया खलीफा और रिहाना जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियां अचानक भारतीय मामलों पर ट्वीट करने लगती हैं। यह कोई स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं होती, बल्कि एक सोची-समझी पीआर स्ट्रेटेजी (PR Strategy) होती है जिसका उद्देश्य भारत सरकार पर दबाव बनाना और देश के भीतर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करना होता है।
- छद्म बुद्धिजीवी (Pseudo-Intellectuals) और एक्टिविस्ट: हमारे अपने ही विश्वविद्यालयों, मीडिया घरानों और एनजीओ में बैठे कुछ लोग, जिन्हें विदेशों से मोटी फंडिंग या पुरस्कार मिलते हैं, भारत के खिलाफ इस युद्ध में 'फिफ्थ कॉलम' (Fifth Column - भीतर के दुश्मन) का काम करते हैं। वे मानवाधिकारों के नाम पर आतंकियों और नक्सलियों का बचाव करते हैं, लेकिन जब देश के बहुसंख्यक समाज या सुरक्षाबलों पर हमला होता है, तो उनकी संवेदनाएं सो जाती हैं।
इस पुस्तक को लिखने का मेरा उद्देश्य इस हाइब्रिड वॉरफेयर के पूरे इकोसिस्टम को डिकोड करना था। जब तक हम इस पैटर्न को नहीं समझेंगे, हम हर बार इनके बहकावे में आकर आपस में लड़ते रहेंगे और देश को कमजोर करते रहेंगे।
6. भारत की उभरती वैश्विक शक्ति और स्थापित लॉबियों की छटपटाहट
आखिर आज ही भारत सबसे ज्यादा निशाने पर क्यों है? इसका उत्तर सीधा है— क्योंकि भारत अब झुकने से इनकार कर रहा है।
आज का भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तेजी से तीसरी बनने की ओर अग्रसर है। हमारी तकनीकी शक्ति (जैसे यूपीआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर), हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम (इसरो), और हमारी वैक्सीन डिप्लोमेसी ने दुनिया को दिखा दिया है कि हम अब किसी के पिछलग्गू नहीं हैं। भू-राजनीतिक (Geopolitical) मंचों पर आज भारत अपनी शर्तों पर विदेश नीति तय करता है। हम रूस से तेल भी खरीदते हैं और अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात भी करते हैं।
यह आत्मनिर्भरता, यह संप्रभुता उन वैश्विक शक्तियों को हजम नहीं हो रही है जो पिछले दो सौ सालों से दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा रही थीं। उन्हें एक ऐसा भारत चाहिए जो हमेशा उनकी रक्षा सामग्री का खरीदार बना रहे, जो उनकी तकनीकों पर निर्भर रहे, और जो उनके इशारों पर अपनी नीतियां बदले।
चूंकि वे हमें आर्थिक या सैन्य रूप से नहीं दबा पा रहे हैं, इसलिए उन्होंने हमारे आंतरिक समाज को तोड़ने के लिए अपने सारे संसाधन झोंक दिए हैं। धार्मिक असहिष्णुता की झूठी रिपोर्ट तैयार करना, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को नीचे दिखाना, और पर्यावरण के नाम पर हमारे उद्योगों को रोकना—ये सब इसी छटपटाहट के हिस्से हैं। मैंने इस पुस्तक में इन सभी अंतरराष्ट्रीय चालों का परत-दर-परत विश्लेषण किया है।
"भारत क्यों निशाने पर? क्यों लिखा?" —इस सवाल का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उत्तर यह है कि मैं भारत के नागरिकों, विशेषकर युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त देखना चाहता हूँ।
हम तब तक किसी युद्ध को नहीं जीत सकते जब तक हमें यह न पता हो कि हमारा दुश्मन कौन है, वह किस रणनीति से लड़ रहा है, और उसके हथियार क्या हैं। यह पुस्तक उस अदृश्य दुश्मन का एक्स-रे (X-Ray) है। यह पुस्तक हमारी शिक्षा, न्यायपालिका, भाषा और इतिहास को मुक्त कराने की एक वैचारिक क्रांति की शुरुआत है।
यह केवल एक किताब नहीं है, यह सत्यान्वेषण की यात्रा में उठाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। यह हमारे पूर्वजों के त्याग, हमारी सभ्यता की अमरता, और हमारे राष्ट्र की संप्रभुता के प्रति मेरी एक छोटी सी आहुति है। मैं चाहता हूँ कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद जब आप अखबार उठाएं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करें, तो आपकी आंखें केवल शब्दों को न पढ़ें, बल्कि उन शब्दों के पीछे छिपे भारत-विरोधी एजेंडे को भी साफ-साफ देख सकें।
अब समय आ गया है कि हम रक्षात्मक होना छोड़ें। नैरेटिव का उत्तर नैरेटिव से, तथ्य का उत्तर तथ्य से, और प्रोपेगैंडा का उत्तर अकाट्य सत्य से दें। यह देश हमारा है, इसकी चेतना हमारी है, और इसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
जय हिंद। वंदे मातरम।