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तथ्यों की ताक़त पर भारी धारणाओं का चक्रव्यूह

2026-09-06  विप्लव विकास

6-7 मई 2025 में संचालित 'ऑपरेशन सिंदूर' में पाकिस्तान व पाक-अधिकृत कश्मीर में 9 आतंकी शिविरों को भारत ने ध्वस्त कर दिया था। भारतीय सशस्त्र बलों ने सामरिक दृष्टि से अपने लक्ष्यों को अचूक सटीकता के साथ हासिल किया था, लेकिन इसके समानांतर जो 'डिजिटल सूचना युद्ध' छिड़ा, उसमें पाकिस्तान ने शुरुआती घंटों में ही एक सोची-समझी रणनीति अपनाकर पश्चिमी मीडिया और वैश्विक कूटनीतिक हलकों में फर्स्ट इनफार्मेशन एडवांटेज लेने का दुस्साहस किया। पाकिस्तान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई का दावा किया था और भारतीय विमानों को मार गिराने का झूठा दावा किया था। भारत के भीतर भी विपक्षी पार्टियों ने सरकार से 'सबूत' मांगने, विशेष संसद सत्र की मांग करने और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपी भ्रामक खबरों को हवा देने का काम किया, भले ही सरकार ने ‘बिफोर-आफ्टर फुटेज’ और कैमरा रिकॉर्डिंग के साथ ठोस प्रमाण पेश किए हों। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे विपक्षी नेताओं द्वारा पीएम मोदी को लिखे पत्र और 'कोई देश भारत के साथ नहीं खड़ा हुआ' जैसे कांग्रेस के आरोप यह साबित करते हैं कि 5जीडब्लू का हथियार अब केवल दुश्मन देशों के पास नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक एजेंडों को आगे बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। डिजिटल दुष्प्रचार, सामाजिक मीडिया एल्गोरिदम, और राजनीतिक ध्रुवीकरण का समन्वय करके एक आधुनिक 'हाइब्रिड वॉरफेयर' का रूप विकसित हो रहा है, जो न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी चुनौती दे रहा है।

वैसे ही  27 फरवरी 2019 की उस ऐतिहासिक घटना जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान ने अपने पुराने MiG-21 बाइसन से पाकिस्तान के अत्याधुनिक F-16 को मार गिराया था। भारत के इस दावे ने F-16 की वैश्विक प्रतिष्ठा को गंभीर चुनौती दे दी और Lockheed Martin ने भारत का 114 लड़ाकू विमानों का प्रतीक्षित सौदा (MMRCA 2.0) पूरी तरह गंवा दिया, जिसमें F-16 प्रमुख दावेदार था। The Print ने जुलाई 2019 में स्पष्ट किया कि "Balakot was the last straw... the IAF is now convinced that the F-16 is a flawed product" और "F-16 never stood a chance to be in IAF fleet. Lockheed Martin messed it up so much।" अमेरिकी विदेश विभाग ने पाकिस्तान द्वारा F-16 के संभावित दुरुपयोग की जांच शुरू की और End-User Agreement के उल्लंघन के मद्देनजर स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति पर कड़ी निगरानी लागू की। जब मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान F-16 और चीनी J-10 दोनों विफल रहे, तो The Researchers ने जून 2025 में रिपोर्ट किया कि Lockheed Martin के शेयर केवल 0.97% बढ़े, और IDRW ने अगस्त 2025 में F-16 को "A Fading Icon Exposed by Operation Sindoor" करार दिया। यह साबित करता है कि 5GW में एक एरियल कॉम्बैट की घटना न केवल तत्काल सैन्य दावों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अरबों डॉलर के रक्षा सौदों, एक पूरे विमान मॉडल की वैश्विक साख, और निर्माता देश के व्यापारिक हितों को सीधे प्रभावित करने की क्षमता रखती है। 

यानी, आधुनिक दौर में एक दावा केवल एक खबर नहीं रहता, वह एक इकनोमिक वेपन और राष्ट्रीय परिसंपत्तियों के अवमूल्यन का जरिया बन जाता है। इसे ही हम 5जीडब्लू  कहते हैं, जहाँ युद्ध की प्रकृति अब केवल प्रत्यक्ष सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह शेयर बाजार, वैश्विक साख और पब्लिक परसेप्शन को सीधी चोट पहुँचाती है।

यह दुष्प्रचार चक्र केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है; इसका सबसे घातक रूप देश के भीतर आंतरिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति को निशाना बनाने में दिखता है। हाल ही में जब भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8% घोषित हुई, तो पूरी दुनिया के अर्थशास्त्री और वैश्विक वित्तीय संस्थान तमाम टेर्रिफ और वैश्विक युद्धो के दौर में भी भारत की इस अभूतपूर्व आर्थिक गति को देखकर आश्चर्यचकित थे। लेकिन इसी दौरान हमारे ही देश के डिजिटल स्पेस में वामपंथियों द्वारा सुनियोजित तरीके से मीम्स की बाढ़ ला दी गई। उनमें से एक बेहद चर्चित मीम कहती है, “भाई मान जाओ कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.8% है, नहीं तो सरकार इसके प्रचार में इतना खर्च कर देगी कि अर्थव्यवस्था ही नीचे आ जाएगी!”

ऊपरी तौर पर देखने पर यह एक निर्दोष व्यंग्य या हंसने-हंसाने का जरिया लग सकता है। लेकिन इनफार्मेशन सिक्योरिटी के दृष्टिकोण से देखें तो यह एक अत्यंत सूक्ष्म, विचार-प्रवर्तक और विषैला मनोवैज्ञानिक प्रहार है। मीम आज की डिजिटल रणभूमि का अदृश्य और घातक हथियार है। मीम कोई तर्क-वितर्क नहीं करता, वह कोई आंकड़े या प्रमाण नहीं देता; वह सीधे इंसान के सबकॉन्सियस माइंड पर हमला करता है और एक विशिष्ट वातावरण का निर्माण करता है।

इस प्रकार, शत्रुतापूर्ण ताकतें बिना कोई बड़ा ढांचा खड़ा किए, हंसते-मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपकर हमारे समाज की नींव अर्थात 'तथ्यों की विश्वसनीयता' पर हमला करती हैं। जब किसी राष्ट्र के नागरिक अपनी ही सेना के पराक्रम, अपनी ही अर्थव्यवस्था के आधिकारिक आंकड़ों और अपनी ही वैज्ञानिक संस्थाओं पर अविश्वास करने लगें, तो वह राष्ट्र बिना एक भी गोली चलाए भीतर से खोखला होने लगता है।

यही वह जगह है जहाँ हमें यह समझना होगा कि 'सूचना-युद्ध' में निष्पक्षता या 'ज़बरदस्ती के संतुलन' के लिए कोई जगह नहीं होती। जब देश की अखंडता, आर्थिक प्रगति और संप्रभुता पर हमला हो रहा हो, तब सत्य के पक्ष में मजबूती से खड़ा होना ही एकमात्र रणनीतिक विकल्प है। 2020-21 के किसान आंदोलनों के दौरान भी हमने देखा कि कैसे वास्तविक स्थानीय मुद्दों के आवरण में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैशटैग चलाकर, बॉट नेटवर्क का सहारा लेकर और मिया खलीफा जैसी हस्तियों से प्रायोजित बयान दिलवाकर भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने की कोशिश की गई।

आज भारत के प्रत्येक नागरिक को यह समझना होगा कि सूचना के इस नए रणक्षेत्र में कोई भी निरपेक्ष दर्शक नहीं है। हममें से हर व्यक्ति इस डिजिटल युद्धक्षेत्र का एक सिपाही भी है और एक संभावित लक्ष्य भी। डिजिटल युग में आपकी उंगली द्वारा दबाया गया एक 'शेयर' केवल एक बटन क्लिक नहीं है; वह इस नए युद्धतंत्र में दुश्मन के हथियार को ताकत देने या फिर भारत के सूचना-कवच को मजबूत करने का निर्णय है। सीमा पर तैनात सैनिक यदि भूगोल की रक्षा कर रहे हैं, तो स्क्रीन के सामने बैठे नागरिक को भारत के 'नैरेटिव और स्वाभिमान' की रक्षा करनी होगी।


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