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ताम्रलिप्त जातीय सरकार और 1942 के समानांतर शासन का इतिहास

2026-08-31  विप्लव विकास

भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल अहिंसक सत्याग्रहों, राजनीतिक वार्ताओं या राष्ट्रीय स्तर के बड़े सम्मेलनों तक सीमित नहीं था। भारत की आज़ादी की नींव में उन अनाम जन-आंदोलनों का खून-पसीना शामिल था, जहाँ साधारण किसानों, महिलाओं और नौजवानों ने विदेशी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। जब-जब ब्रिटिश साम्राज्य ने क्रूर दमनकारी नीतियां अपनाईं, तब-तब भारत के स्थानीय अंचलों ने अद्वितीय पराक्रम का परिचय दिया।

1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' (Quit India Movement) के दौरान पश्चिम बंगाल के अविभाजित मेदिनीपुर (खासकर तामलुक उप-संभाग) में जो हुआ, वह केवल विद्रोह नहीं बल्कि आत्मनिर्भर स्वशासन की एक ऐतिहासिक मिसाल था। 17 दिसंबर 1942 को यहाँ 'ताम्रलिप्त जातीय सरकार' (Tamralipta Jatiya Sarkar / Tamluk National Government) की स्थापना हुई। यह कोई प्रतीकात्मक विरोध नहीं था, बल्कि लगभग 21 महीनों तक ब्रिटिश हुकूमत के समानांतर चलने वाला एक संपूर्ण, संगठित और आत्मनिर्भर शासन तंत्र था।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1942 का भारत और मेदिनीपुर की क्रांतिकारी विरासत

8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को "भारत छोड़ो" का अल्टीमेटम दिया और देशवासियों को "करो या मरो" (Do or Die) का मंत्र दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी और 9 अगस्त की सुबह तक महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

ब्रिटिश सरकार का मानना था कि शीर्ष नेतृत्व को सलाखों के पीछे डालकर आंदोलन की कमर तोड़ दी जाएगी। लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। देश नेतृत्वविहीन जरूर हुआ, पर दिशाहीन नहीं।

बंगाल का मेदिनीपुर ज़िला पहले से ही स्वतंत्रता संग्राम का गढ़ रहा था। यह वही ज़िला था जिसने खुदीराम बोस जैसे अमर शहीद को जन्म दिया था। जब मेदिनीपुर के लोगों तक 'करो या मरो' का संदेश पहुँचा, तो उन्होंने केवल जेल भरो आंदोलन तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि विदेशी शासन को अपनी ज़मीन से पूरी तरह बेदखल करने का संकल्प ले लिया।

2. ताम्रलिप्त जातीय सरकार का उदय: ब्रिटिश तंत्र का खात्मा

तामलुक के स्थानीय नेताओं और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने भांप लिया था कि जब तक ब्रिटिश पुलिस स्टेशन, कचहरियां और संचार माध्यम चालू रहेंगे, तब तक दमन जारी रहेगा।

सितंबर 1942 में तामलुक, सुताहाटा, महिषादल और नंदीग्राम में समन्वित हमले शुरू हुए:

टेलीग्राफ और टेलीफोन के तार काट दिए गए।

सड़कों और पुलों को ध्वस्त कर दिया गया ताकि ब्रिटिश सेना और पुलिस की गाड़ियां न पहुँच सकें।

सरकारी थानों और प्रशासनिक भवनों पर तिरंगा फहराने के लिए शांतिपूर्ण जनसैलाब उमड़ पड़ा।

जब औपनिवेशिक प्रशासन के सभी स्थानीय साधन ठप हो गए, तब जनता ने महसूस किया कि उन्हें अपनी व्यवस्था खुद संभालनी होगी। इसी विचार के तहत 17 दिसंबर 1942 को 'ताम्रलिप्त जातीय सरकार' की औपचारिक घोषणा की गई।

सतीश चन्द्र सामंत, ताम्रलिप्त जातिय सरकार, सर्वाधिनायक, भारत छोड़ो आंदोलन

इसके शीर्ष नेतृत्व में चार प्रमुख नाम थे:

  1. सतीश चंद्र सामंत (प्रथम सर्वाधिकार/डिक्टेटर)
  2. सुशील कुमार धारा (कमांडर, विद्युत वाहिनी)
  3. अजय कुमार मुखोपाध्याय (जो बाद में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने)
  4. मातंगिनी हाजरा (आंदोलन की नैतिक व आध्यात्मिक प्रेरणा)

3. मातंगिनी हाजरा: 73 वर्ष की 'गांधी बूढ़ी' का अमर बलिदान

ताम्रलिप्त जातीय सरकार की नींव जिस अदम्य साहस पर टिकी थी, उसका सबसे उज्ज्वल प्रतीक 73 वर्षीय वीरांगना मातंगिनी हाजरा थीं। स्थानीय लोग उन्हें श्रद्धा से 'गांधी बूढ़ी' (वृद्ध गांधीवादी महिला) कहते थे।

29 सितंबर 1942 को जब तामलुक थाने पर शांतिपूर्ण कब्जे के लिए जुलूस निकला, तो सबसे आगे हाथ में तिरंगा थामे मातंगिनी हाजरा चल रही थीं। ब्रिटिश पुलिस ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां बरसाना शुरू कर दिया।

पहली गोली मातंगिनी के एक हाथ पर लगी, लेकिन उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और दूसरे हाथ में थाम लिया।

दूसरी गोली उनके दूसरे हाथ पर लगी, फिर भी वे आगे बढ़ती रहीं और 'वंदे मातरम्' का नारा लगाती रहीं।

तीसरी गोली उनके माथे पर लगी। वे ज़मीन पर गिर पड़ीं, लेकिन मरते दम तक राष्ट्रीय ध्वज को ज़मीन पर नहीं छूने दिया।

मातंगिनी हाजरा के इस सर्वोच्च बलिदान ने स्थानीय जनता के भीतर से मौत का डर हमेशा के लिए मिटा दिया। उनका यह संकल्प—"पिछाबोनी" (मैं पीछे नहीं हटूंगी)—आंदोलन का मूल मंत्र बन गया।

4. ताम्रलिप्त जातीय सरकार का प्रशासनिक ढांचा: एक समानांतर व्यवस्था

ताम्रलिप्त जातीय सरकार केवल एक विद्रोही गुट नहीं थी, बल्कि उसके पास आधुनिक लोकतंत्र की तरह कार्यपालिका, न्यायपालिका और रक्षा तंत्र मौजूद था।

क. कार्यपालिका और विभागीय व्यवस्था

सरकार का संचालन एक 'सर्वाधिकार' (Director/Dictator) के हाथ में होता था, जिसे कैबिनेट की सहायता प्राप्त थी। सतीश चंद्र सामंत के बाद कई अन्य नेताओं ने गिरफ्तारी के बाद बारी-बारी से इस पद को संभाला। सरकार के तहत निम्नलिखित प्रमुख विभाग सक्रिय रूप से काम कर रहे थे:

  • गृह विभाग: कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन बनाए रखना।
  • युद्ध/रक्षा विभाग: ब्रिटिश हमलों से गांवों की सुरक्षा करना।
  • न्याय विभाग: स्थानीय विवादों का समाधान करना।
  • स्वास्थ्य एवं राहत विभाग: अकाल और बीमारियों से निपटना।
  • शिक्षा एवं राजस्व विभाग: स्थानीय स्कूलों को अनुदान और कर व्यवस्था संभालना।

ख. विद्युत वाहिनी और भगिनी सेना (सैन्य एवं स्वयंसेवक संगठन)

सुशील कुमार धारा के नेतृत्व में 'विद्युत वाहिनी' (Lightning Force) का गठन किया गया था। यह एक अनुशासित और प्रशिक्षित बल था जिसमें हज़ारों युवक शामिल थे।

विद्युत वाहिनी के तीन प्रमुख अंग थे: लड़ाकू शाखा, गुप्तचर शाखा और एम्बुलेंस/प्राथमिक उपचार दल।

महिलाओं के लिए 'भगिनी सेना' बनाई गई थी, जिसने न केवल राहत कार्यों में मदद की बल्कि ब्रिटिश पुलिस की गतिविधियों पर नज़र रखने में भी अहम भूमिका निभाई।

ग. लोक-अदालतें (People's Courts)

अंग्रेजी कचहरियों का पूरी तरह बहिष्कार किया गया था। जातीय सरकार ने अपनी स्वतंत्र अदालतें स्थापित कीं, जिन्हें 'न्याय चक्र' कहा जाता था।

इन अदालतों में ज़मीन के विवाद, पारिवारिक कलह और आपराधिक मामलों का त्वरित निपटारा होता था।

मुकदमों में कोई भारी फीस नहीं लगती थी और दोनों पक्षों की सहमति से न्याय दिया जाता था।

लगभग 1,600 से अधिक मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा इन लोक-अदालतों द्वारा किया गया था।

5. अकाल और आपदा में लोक कल्याणकारी शासन

1942 के उत्तरार्ध में मेदिनीपुर को भीषण समुद्री चक्रवात (Cyclone) का सामना करना पड़ा और इसके तुरंत बाद 1943 का विनाशकारी 'बंगाल का अकाल' (Bengal Famine) आया।

ब्रिटिश सरकार ने विंस्टन चर्चिल की क्रूर नीतियों के तहत बंगाल के चावल को युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया और 'स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी' (Scorched Earth Policy) के तहत नौकाएं और संचार साधन नष्ट कर दिए। जहाँ अंग्रेज सरकार जनता को भूखा मरने के लिए छोड़ चुकी थी, वहीं ताम्रलिप्त जातीय सरकार ने राहत और पुनर्वास की मिसाल पेश की:

  • धनी जमींदारों और जमाखोरों के गोदामों से अतिरिक्त अनाज ले कर गरीबों और पीड़ितों में समान रूप से बांटा गया।
  • निशुल्क भोजन केंद्र (लंगर) और चिकित्सा शिविर स्थापित किए गए।
  • स्थानीय स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को आर्थिक अनुदान दिया गया ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके।

6. जन-संचार का साधन: भूमिगत समाचार पत्र ‘विप्लवी’

किसी भी जन-आंदोलन की सफलता उसकी सूचना प्रणाली पर निर्भर करती है। अंग्रेजी पाबंदियों और सेंसरशिप के बावजूद ताम्रलिप्त जातीय सरकार ने अपना भूमिगत मुखपत्र 'विप्लवी' (Biplabi) प्रकाशित किया।

यह बुलेटिन साइक्लोस्टाइल मशीनों पर गुप्त ठिकानों पर छापा जाता था।

विद्युत वाहिनी के जांबाज धावक रात के अंधेरे में इस समाचार पत्र को गाँव-गाँव और घर-घर पहुँचाते थे।

इसमें सरकार के निर्देश, स्वतंत्रता संग्राम की ताज़ा खबरें और ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों का ब्योरा दर्ज होता था, जिससे जनता का मनोबल कभी नहीं टूटा।

7. 21 महीने का सफर और ऐतिहासिक समापन

ताम्रलिप्त जातीय सरकार 17 दिसंबर 1942 से 31 अगस्त 1944 तक लगभग 21 महीने तक सफलतापूर्वक कार्यरत रही। ब्रिटिश पुलिस और सेना के तमाम क्रूर अभियानों, सामूहिक जुर्मानों और दमन के बावजूद अंग्रेज इस समानांतर सरकार को समाप्त नहीं कर सके।

मई 1944 में जब महात्मा गांधी जेल से रिहा हुए, तो उन्हें मेदिनीपुर के इस असाधारण संघर्ष की जानकारी मिली। गांधीजी ने आंदोलनकारियों के अदम्य साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की, लेकिन साथ ही उन्होंने सलाह दी कि बदलती राष्ट्रीय परिस्थितियों में भूमिगत आंदोलन को विराम देकर खुले जन-सत्याग्रह की ओर लौटना चाहिए।

गांधीजी के आदेश का सम्मान करते हुए 1 सितंबर 1944 को ताम्रलिप्त जातीय सरकार को आधिकारिक रूप से भंग कर दिया गया और इसके प्रमुख नेताओं ने खुद को कानून के हवाले कर दिया।

8. ताम्रलिप्त जातीय सरकार का ऐतिहासिक मूल्यांकन

ताम्रलिप्त जातीय सरकार केवल 1942 के आंदोलन की एक घटना नहीं थी, बल्कि यह इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण थी कि भारत का समाज विदेशी हुकूमत के बिना भी एक न्यायसंगत, लोकतांत्रिक और कल्याणकारी शासन चलाने में सक्षम था।

इसने सिद्ध किया कि:

स्वराज की समझ: जनता के लिए आज़ादी केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि स्थानीय समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान थी।

समानांतर सत्ता का मॉडल: बलिया (चित्तू पांडे) और सतारा (नाना पाटिल) की तरह मेदिनीपुर ने भी दिखाया कि जन-एकता के आगे आधुनिक साम्राज्यवादी ताकतें भी बेबस हो जाती हैं।

लोक चेतना का जागरण: ग्रामीण भारत का सामान्य नागरिक भी इतिहास का मूक दर्शक नहीं, बल्कि इतिहास का निर्माता था।

मेदिनीपुर की 'ताम्रलिप्त जातीय सरकार' भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जो हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र की असली शक्ति उसकी जनता में बसती है। सतीश चंद्र सामंत, मातंगिनी हाजरा, सुशील धारा और हज़ारों अनाम ग्रामीणों का यह प्रयोग आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों, जनसेवा और आत्मनिर्भरता के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है।

 

 

संदर्भ सूची (References)

  • Chakrabarty, Bidyut. (1997). Local Politics and Indian Nationalism: Midnapore 1919-1944. Manohar Publishers & Distributors.
  • Samanta, Satish Chandra et al. (1946). August Revolution and Two Years' National Government in Midnapore. Calcutta: Orient Book Company.
  • Ministry of Culture, Government of India. Azadi Ka Amrit Mahotsav - District Repository: Tamralipta Jatiya Sarkar. Amrit Mahotsav Portal.
  • Indian History Collective. A Parallel Government in British India (Parts 1 & 2). Indian History Collective.
  • Wikipedia Tamralipta Jatiya Sarkar
  • Greenough, Paul R. (1982). Prosperity and Misery in Modern Bengal: The Famine of 1943-1944. Oxford University Press.

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