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सोशल मीडिया: लोकतंत्र का डिजिटल कुरुक्षेत्र

2026-06-05  Viplav Vikas

आज के दौर में सूचना की गति राजनीति की दिशा तय करती है। पारंपरिक मीडिया की अपनी सीमाएँ हैं, लेकिन डिजिटल मीडिया ने 'रियल-टाइम' संवाद को जन्म दिया है। अब मतदाता केवल सूचना प्राप्तकर्ता नहीं है, बल्कि वह स्वयं एक कंटेंट क्रिएटर और प्रचारक बन चुका है। सूचना की गति और राजनीति के बदलते  व्याकरण ने डिजिटल अभियान को अनिवार्य बना दिया। यह समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने का सबसे सटीक जरिया है, जो शायद किसी राजनैतिक रैली में न जाए, लेकिन दिन में सौ बार अपना फोन अवश्य देखता है। इसने लोकतंत्र को 'फिजिकल' से 'डिजिटल' स्पेस में शिफ्ट कर दिया है, जहाँ विमर्श अब चाय की दुकानों से ज्यादा व्हाट्सएप ग्रुप्स में गढ़ा जाता है।

डिजिटल कैंपेन का इतिहास: वैश्विक फलक से भारत की जमीन तक

वैश्विक स्तर पर डिजिटल चुनाव अभियान की वास्तविक शुरुआत 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से मानी जाती है, जहाँ बराक ओबामा ने फेसबुक और ईमेल मार्केटिंग के जरिए युवाओं को जोड़कर और रिकॉर्ड फंड जुटाकर दुनिया को चौंका दिया था। इसके बाद 2012 के अमेरिकी चुनावों में 'बिग डेटा' का उपयोग एक हथियार की तरह हुआ। भारत में डिजिटल चुनाव अभियान की शुरुआत तकनीकी रूप से 2009 में लालकृष्ण आडवाणी ने की थी, लेकिन इसे एक सफल, आक्रामक और गेम-चेंजिंग हथियार के रूप में 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में और लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने स्थापित किया। 2014 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति के तौर-तरीकों को हमेशा के लिए बदल दिया। 'चाय पर चर्चा' जैसे अभियानों और थ्री-डी होलोग्राम रैलियों ने यह साबित कर दिया कि तकनीक अब केवल सहायक नहीं, बल्कि चुनावी जीत की मुख्य पटकथा है। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा की जित के बाद फिनान्सिअल टाइम्स ने नरेंद्र मोदी को 'India's first social media prime minister' . 2019 और उसके बाद के विधानसभा चुनावों तक आते-आते भारत दुनिया का सबसे बड़ा 'डिजिटल इलेक्शन ग्राउंड' बन गया।

जनसंपर्क का सीधा और प्रभावी माध्यम: बिना किसी 'फिल्टर' के संवाद

डिजिटल मीडिया ने नेताओं और जनता के बीच की दीवार को गिरा दिया है। पहले नेता की बात अखबारों की सुर्खियों या टीवी की बाइट्स के माध्यम से छनकर पहुंचती थी, जिसे पत्रकार अपने हिसाब से मोड़ सकते थे। अब एक फेसबुक लाइव या इंस्टाग्राम रील के जरिए नेता सीधे अपनी बात 'अनकट' रूप में रख सकता है। यह माध्यम न केवल सस्ता है, बल्कि इसकी पहुँच असीमित है। एक छोटे से कस्बे का प्रत्याशी भी बिना भारी-भरकम विज्ञापन बजट के लाखों लोगों तक अपनी विचारधारा पहुँचा सकता है।

युवा और शहरी मतदाताओं का एकीकरण: स्मार्टफोन से पोलिंग बूथ तक

भारत की 65% आबादी युवाओं की है, जो अपना अधिकांश समय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताती है। शहरी और युवा मतदाता, जो अक्सर राजनीति से विमुख रहते थे, उन्हें गेमिंग, मीम्स और इंटरैक्टिव पोल्स के जरिए राजनीति में शामिल किया गया है। डिजिटल स्ट्रैटेजी अब इस पर केंद्रित होती है कि कैसे एक 15 सेकंड की रील के माध्यम से मतदाता को बूथ तक जाने के लिए प्रेरित किया जाए। यह 'पॉलिटिकल कंज्यूमरिज्म' का दौर है, जहाँ हर वोटर को एक विशेष 'यूजर' मानकर उसे कंटेंट परोसा जा रहा है।

डेटा एनालिटिक्स: लक्षित और निजीकृत प्रचार की शक्ति

आज के चुनाव 'डेटा' पर लड़े जा रहे हैं। डिजिटल स्ट्रैटेजिस्ट मतदाता सूची को डिजिटल डेटा के साथ जोड़कर यह पता लगाते हैं कि किस क्षेत्र में लोग किस मुद्दे पर नाराज हैं। डेटा एनालिटिक्स की मदद से 'माइक्रो-टारगेटिंग' की जाती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष क्षेत्र में पानी की समस्या है, तो वहां के फेसबुक यूजर्स को केवल पानी की समस्या के समाधान वाले वीडियो ही दिखाए जाएंगे। यह निजीकृत प्रचार मतदाता के मनोविज्ञान पर सीधा असर डालता है।

रुझान निर्धारण और जनभावना: मीम्स और ट्रेंड्स का राजनीतिक शास्त्र

सोशल मीडिया पर क्या 'ट्रेंड' कर रहा है, यह तय करता है कि अगले दिन अखबारों की सुर्खी क्या होगी। मीम्स आज के दौर के 'कार्टूनिस्ट' हैं। एक प्रभावी मीम विरोधी दल की साख को पल भर में धूमिल कर सकता है। सेंटीमेंट एनालिसिस टूल्स के जरिए डिजिटल वॉर रूम यह ट्रैक करते हैं कि जनता का झुकाव किस तरफ है। यदि कोई मुद्दा नकारात्मक जा रहा है, तो तुरंत 'नैरेटिव' बदलने की कवायद शुरू कर दी जाती है।

डिजिटल वॉर रूम और वॉलंटियर आर्मी: अदृश्य शक्ति का संचालन

हर बड़ी पार्टी के पास अब एक हाई-टेक 'डिजिटल वॉर रूम' है। यहाँ से व्हाट्सएप (WhatsApp) के हजारों समूहों का नेटवर्क संचालित होता है। इन समूहों में बैठे 'डिजिटल वॉलंटियर्स' किसी भी सूचना को जंगल की आग की तरह फैलाने की क्षमता रखते हैं। ये वॉर रूम चौबीसों घंटे विपक्ष के हमलों का जवाब देने और अपने पक्ष में सकारात्मक माहौल बनाने का काम करते हैं। यह एक ऐसी समानांतर व्यवस्था है जो चुनाव के दौरान जमीन पर मौजूद कार्यकर्ताओं से कहीं अधिक सक्रिय रहती है।

चुनावी अभियान में सोशल मीडिया की भूमिका अब अपरिहार्य है। इसने चुनावी प्रक्रिया को समावेशी और सक्रिय तो बनाया है, लेकिन साथ ही साथ 'फेक न्यूज' और 'डेटा चोरी' जैसे खतरों को भी जन्म दिया है। एक जागरूक लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि जहाँ डिजिटल माध्यमों का उपयोग मतदाता जागरूकता और सूचना के लिए हो, वहीं इसके अनैतिक प्रयोगों पर लगाम लगाने के लिए सख्त नियामक ढांचा और जनता की अपनी समझ  भी विकसित हो। डिजिटल कैंपेन केवल चुनाव जीतने का जरिया नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनने का माध्यम होना चाहिए।

 

चुनाव और डिजिटल दुनिया: कुछ अनछुए एवं महत्वपूर्ण तथ्य

डार्क ऐड्स: ये ऐसे विज्ञापन होते हैं जो केवल लक्षित दर्शकों को ही दिखते हैं, सार्वजनिक रूप से किसी की प्रोफाइल पर उपलब्ध नहीं होते। इनका उपयोग गुप्त रूप से नैरेटिव सेट करने में किया जाता है।

इको चैम्बर्स: सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं जो हम देखना चाहते हैं। इससे मतदाता केवल अपनी पसंद की विचारधारा को ही सुनता है और समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण (Polarization) बढ़ता है।

बॉट पॉलिटिक्स: कई बार फर्जी अकाउंट्स (Bots) का इस्तेमाल करके कृत्रिम रूप से किसी हैशटैग को ट्रेंड कराया जाता है ताकि 'जनभावना' का भ्रम पैदा किया जा सके।

डीपफेक और एआई: अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए नेताओं के फर्जी वीडियो और आवाज (Deepfakes) बनाकर मतदाताओं को भ्रमित करने का खतरा बढ़ गया है, जो आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती होगी।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी: भारत में चुनावी विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र व्हाट्सएप है, जहाँ एन्क्रिप्शन के कारण सूचनाओं की सत्यता की जाँच करना सबसे कठिन कार्य है।

. भारत में डिजिटल चुनावी प्रचार की शुरुआत: लालकृष्ण आडवाणी (2009)

पहला प्रयोग: भारत में चुनावी अभियान में डिजिटल टूल्स का पहला संगठित उपयोग 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी के लिए हुआ था।

माध्यम: इस अभियान में आडवाणी जी की आधिकारिक वेबसाइट, राजनीतिक ब्लॉग, 'Friends of BJP' जैसे डिजिटल मंच और बड़े पैमाने पर SMS मार्केटिंग का इस्तेमाल किया गया था।

सीमा: उस दौर में भारत में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या बेहद कम थी और फेसबुक/ट्विटर अपनी शुरुआती अवस्था में थे, इसलिए यह अभियान वोटों में तब्दील नहीं हो सका।

2. पहला व्यापक और क्रांतिकारी प्रयोग: नरेंद्र मोदी (2012 और 2014)

गुजरात प्रयोग (2012): नरेंद्र मोदी ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में तकनीक का अभूतपूर्व इस्तेमाल किया, जहाँ दुनिया में पहली बार बड़े पैमाने पर 3D होलोग्राम रैलियों के जरिए एक साथ कई जगहों पर भाषण दिए गए।

द फर्स्ट सोशल मीडिया इलेक्शन (2014): 2014 का आम चुनाव भारत का पहला 'सोशल मीडिया चुनाव' बना। नरेंद्र मोदी ने फेसबुक, ट्विटर (X), यूट्यूब और व्हाट्सएप को मुख्यधारा का चुनावी हथियार बनाया।

रणनीतिक बदलाव: उन्होंने पारंपरिक मीडिया पर निर्भर रहने के बजाय सोशल मीडिया के जरिए सीधे करोड़ों युवाओं (First-Time Voters) के स्मार्टफोन तक पहुँच बनाई और 'अब की बार मोदी सरकार' जैसे नैरेटिव को घर-घर पहुँचाया।

 

 

यह लेख मुंबई से प्रकाशित हिंदी विवेक पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है।


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