देश में जनगणना की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन जनगणना केवल जनसंख्या गिनने का अभ्यास नहीं, बल्कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को समझने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यह वह अवसर है जब हमें आँकड़ों के पीछे छिपे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और उनके सांस्कृतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभावों का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। इक़बाल की प्रसिद्ध पंक्ति “यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गए जहाँ से…”सुनकर एक प्रश्न मन में उठता है कि आखिर इतनी महान सभ्यताएँ इतिहास के मंच से कैसे विलुप्त हो गईं? उनके भूभाग, नदियाँ और संसाधन तो आज भी मौजूद हैं, पर उनकी मूल सांस्कृतिक पहचान इतिहास की स्मृतियों तक सीमित होकर रह गई। कारण यह नहीं था कि भूमि नष्ट हो गई; बल्कि उस भूमि का सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय चरित्र बदल गया।
इतिहास बताता है कि जब किसी क्षेत्र का जनसंख्या संतुलन निर्णायक रूप से बदलता है, तो उसके साथ संस्कृति, राजनीति और सामाजिक दिशा भी बदलने लगती है। आज का युग पारंपरिक युद्धों का नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय प्रतिस्पर्धा का है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में संख्या केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत होती है। इसलिए जनगणना के आँकड़ों को केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्र के दीर्घकालिक चरित्र और सभ्यतागत भविष्य के संकेतक के रूप में देखना आवश्यक है।
इस सन्दर्भ में स्पेन के उदाहरण को देखना होगा। स्पेन, जो कभी पूरी तरह ईसाई देश था, आठवीं शताब्दी में जनसांख्यिकीय और सैन्य आक्रमण का शिकार हुआ। वर्ष 711 में उमय्यद खिलाफत के मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इबेरियन प्रायद्वीप पर कब्ज़ा कर लिया। देखते ही देखते, अगले कुछ दशकों में वहाँ की जनसांख्यिकी को पूरी तरह बदल दिया गया। चर्चों को मस्जिदों में बदला जाने लगा और स्पेन की मूल कल्चरल पहचान को दबाकर उसे इस्लामिक अमीरात (अल-अंडालूस) घोषित कर दिया गया। स्पेन की मूल आबादी अपने ही देश में अल्पसंख्यक या दोयम दर्जे की नागरिक बन गई। परंतु, स्पेन का इतिहास हमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण और जनसांख्यिकीय प्रतिरोध का एक अद्वितीय उदाहरण भी पेश करता है। अपनी खोई हुई पहचान और भूमि को वापस पाने के लिए स्पेन के मूल निवासियों ने जो संघर्ष शुरू किया, उसे इतिहास में 'रिकॉन्क्विस्टा' यानी 'पुनर्विजय' के नाम से जाना जाता है। यह कोई छोटा-मोटा आंदोलन नहीं था, बल्कि यह 700 वर्षों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला एक महा-संग्राम था। अंततः, वर्ष 1492 में ग्रेनाडा के पतन के साथ स्पेन ने अपनी खोई हुई पहचान को पूर्णतः वापस पाया और वह पुनः एक क्रिश्चियन देश बना। स्पेन का यह 700 साल का लंबा संघर्ष यह साबित करता है कि जनसांख्यिकी और संस्कृति को खोना जितना आसान है, उसे वापस पाने में पीढ़ियों का रक्त और सदियों का समय लग जाता है।
भूगोल बदलने से बहुत पहले वहाँ की जनसांख्यिकीय संरचना को योजनाबद्ध तरीके से बदला जाता है। हमारे सामने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रत्यक्ष उदाहरण मौजूद हैं। ये क्षेत्र कभी उपनिषदों की ऋचाओं, भगवान बुद्ध के धम्म और पंचतंत्र की कहानियों के जीवंत सांस्कृतिक केंद्र थे। तक्षशिला और शारदा पीठ जैसे महान ज्ञान केंद्र इसी भूमि पर स्थित थे। परंतु, जैसे-जैसे इन क्षेत्रों में जनसंख्या का चरित्र बदला, वैसे-वैसे इनका भूगोल और राजनीतिक निष्ठा भी भारत की सांस्कृतिक परिधि से हमेशा के लिए बाहर हो गई। बामियान में बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं का तोड़ा जाना उस पूरे भूगोल के प्राचीन चरित्र की अंतिम विदाई की आधिकारिक घोषणा थी।
संख्या बल और समाज की सांस्कृतिक प्रकृति ही वह अदृश्य कील होती है, जो किसी भी भूखंड को राष्ट्र के मानचित्र से मजबूती से बांध कर रखती है। जब वह कील ढीली पड़ती है, तो भूगोल का उखड़ना निश्चित हो जाता है।1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं का उनके ही पैतृक घरों से रातों-रात सामूहिक निष्कासन केवल एक सांप्रदायिक दंगा नहीं था। वह वास्तव में एक विशिष्ट समाज के संपूर्ण उन्मूलन और एक निश्चित क्षेत्र के राजनीतिक चरित्र को बदलने का अत्यंत सफल और क्रूर 'डेमोग्राफिक क्लींजिंग' का प्रयोग था। आज कश्मीर घाटी का जो स्वरूप हमारे सामने है, वह इसी जनसांख्यिकीय असंतुलन का परिणाम है।
किसी भी समाज या राष्ट्र की 'हस्ती' और उसकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता तभी तक बची रहती है, जब तक उस समाज के मूल लोग अपनी पैतृक भूमि पर प्रभावी संख्या बल में विद्यमान रहते हैं। जनसांख्यिकी का असंतुलन अंततः राष्ट्र के विभाजन या उसकी मूल चेतना की मृत्यु का मार्ग प्रशस्त करता है। ऐसे में, इक़बाल की जो पंक्तियाँ सुनने में बहुत कर्णप्रिय और सांत्वनापूर्ण लगती हैं, वे वास्तव में एक जीवंत समाज को गहरे आत्ममुग्धता और छद्म सुरक्षा-बोध की निद्रा में सुला देने वाली एक बेहद खतरनाक लोरी भी साबित हो सकती हैं। भारत एक निःशस्त्र परन्तु घातक युद्ध के सम्मुखीन है। जनसंख्या के मोर्चे पर यह जो युद्ध है, यदि आज की पीढ़ी ने इस परिस्थिति में इतिहास के इन सबकों को नहीं सीखा, स्पेन के 700 वर्षों के संघर्ष को नहीं समझा, और सीख नहीं ली, तो आने वाली पीढ़ियों के पास केवल पछतावा ही शेष रहेगा। जनगणना के इस दौर में, यह आँकड़ों से परे जाकर अपनी सांस्कृतिक सीमाओं को सुरक्षित करने का संकल्प लेने का समय है।
