मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव का माहौल गर्म हो चुका था। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से फैलने लगा। वीडियो में नागपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस दिखाई दे रही थी। पीछे बड़े अक्षरों में “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ” अंग्रेजी और हिंदी लिखा था। मंच से कांग्रेस के समर्थन की बात कही जा रही थी। कुछ सोशल मीडिया अकांउट्स ने इसे इस अर्थ में साझा किया कि संघ ने कांग्रेस के समर्थन की घोषणा कर दी है। वीडियो वास्तविक था, प्रेस कॉन्फ्रेंस वास्तविक थी और उसमें दिखाई देने वाला संगठन भी अपने आपको आरएसएस कह रहा था। लेकिन कहानी में एक महत्वपूर्ण तथ्य छिपा था। यह डाक्टर हेडगेवार द्वारा स्थापित आरएसएस नहीं था। नागपुर के सामाजिक कार्यकर्ता जनार्दन मून ने अलग संगठन के रूप में आरएसएस नाम का इस्तेमाल किया था। उन्होंने 2017 में इस नाम से अपने संगठन को पंजीकृत कराने का प्रयास भी किया था, जिसे बाद में अदालत में चुनौती मिली और पंजीकरण का दावा स्वीकार नहीं हुआ। 2024 में इसी संगठन की प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो कांग्रेस के समर्थन के संदर्भ में वायरल हुआ। जबकि वास्तविक संघ ने ऐसा कोई समर्थन किया ही नहीं था।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोई डीप फेक आवश्यक नहीं था। चेहरा नकली नहीं था, आवाज कृत्रिम नहीं थी और विडियो कंप्यूटर जेनरेटेड नहीं था। सामग्री वास्तविक थी, लेकिन उसकी आइडेंटिटी और कॉन्टेक्स्ट को लेकर पैदा हुआ भ्रम राजनीतिक नैरेटिव को बदल सकता था। यही 21वीं सदी के इनफार्मेशन वॉरफेयर की एक खतरनाक विशेषता है। झूठ हमेशा पूरी तरह गढ़ा हुआ नहीं होता; कभी-कभी आधा सच, अधूरा संदर्भ और सही समय पर किया गया एम्प्लिफिकेशन भी पर्याप्त होता है।
विचारिए कि मतदाता को प्रभावित करना राजनीतिक संवाद कब तक है और मेनिपुलेशन कब शुरू होता है? लोकतंत्र में राजनीतिक पर्सुएशन कोई समस्या नहीं है। राजनीतिक दल अपने विचार बताते हैं, अपनी उपलब्धियों का प्रचार करते हैं, विरोधियों की नीतियों की आलोचना करते हैं और मतदाताओं से समर्थन मांगते हैं। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। चुनाव तो कंपीटींग आईडियाज और कंपीटींग क्लेम्स के बीच नागरिक के निर्णय की प्रक्रिया है।
लेकिन पर्सुएशन और मेनिपुलेशन एक ही चीज नहीं हैं। पर्सुएशन नागरिक के सामने तर्क रखता है; मेनिपुलेशन नागरिक की धारणा को इस प्रकार प्रभावित करने की कोशिश करता है कि वह अधूरी, झूठी या भ्रामक सूचना के आधार पर निर्णय ले। यदि किसी नेता का वास्तविक बयान दिखाया जाए और उसका राजनीतिक अर्थ समझाया जाए, तो वह पर्सुएशन है। लेकिन यदि उसी विडियो को काटकर ऐसा अर्थ पैदा किया जाए जो मूल बयान में था ही नहीं, तो मामला बदल जाता है। इसी तरह किसी संगठन का वास्तविक विडियो दिखाना अपने आप में मीसइंफार्मेशन नहीं है; लेकिन उस संगठन को किसी दूसरे प्रसिद्ध संगठन के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक संवाद बन सकता है।
2019 के आम चुनाव तक सोशल मीडिया एक मेन मीडियम बन चुका था। इलेक्शन कमीशन ने वॉलंटरी कोड ऑफ एथिक्स लागू किया ताकि पॉलिटिकल एडवरटाइजिंग में ट्रांसपेरेंसी आए। लेकिन 2024 तक यूट्यूब शॉर्ट्स, इंस्टाग्राम रील्स, व्हाट्सएप मैसेज, मीम पेजेस और टारगेटेड डिजिटल एडवरटाइजमेंट्स ने कम्युनिकेशन को अत्यंत फ्रैगमेंटेड और फास्ट बना दिया। मई 2024 में कमीशन को एआई जनित फेक कंटेंट और भ्रामक जानकारियों पर रोक लगाने तथा शिकायत मिलने के तीन घंटे के भीतर ऐसी सामग्री हटाने का डायरेक्शन देना पड़ा।
एआई ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। किसी नेता की आवाज की नकल करना, किसी चेहरे को दूसरे विडियो में लगाना, कृत्रिम भाषण तैयार करना या ऐसी तस्वीर बनाना जो कभी अस्तित्व में ही नहीं थी—अब इन सबकी तकनीकी बाधाएं तेजी से कम हो रही है। एआई स्वयं न तो लोकतांत्रिक है, न गैर-लोकतांत्रिक। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
माइक्रो टार्गेटिंग इनफार्मेशन वॉरफेयर का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है। डिजिटल प्लेटफार्म्स अलग-अलग आडिएंस तक अलग-अलग संदेश पहुँचाने की क्षमता रखते हैं। युवाओं के लिए रोजगार, किसानों के लिए कृषि, मध्यम वर्ग के लिए कर और किसी क्षेत्र के मतदाताओं के लिए स्थानीय मुद्दे, एक ही राजनीतिक कैंपेन कई अलग-अलग नैरेटिव्स में दिखाई दे सकता है। आडिएंस स्पेसिफिक कम्युनिकेशन अपने आप में मेनिपुलेशन नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी समूह की कमजोरियां, भय या पूर्वाग्रह को पहचानकर जानबूझकर डिसेप्टिव कंटेंट के माध्यम से एक्सप्लाइट किया जाए। इसके साथ कोऑर्डिनेटेड इन्फ्लुएंस जुड़ता है, जहाँ अनेक अकाउंट्स मिलकर एक ही नैरेटिव को रिपीट करते हैं और उसे 'पब्लिक ओपिनियन' के रूप में एस्टेब्लिश करते हैं। मेन क्वेश्चन कोऑर्डिनेशन का नहीं, बल्कि ऑथेंटिसिटी और डिसेप्शन का है।
2024 में चुनाव आयोग की मिथक बनाम वास्तविकता पहल ने स्पष्ट किया कि चुनावी मिसइन्फॉर्मेशन केवल 'फेक न्यूज' नहीं है, बल्कि यह कॉन्टेक्स्ट, टाइमिंग, आइडेंटिटी और साइकोलॉजी का एक कॉम्प्लेक्स कॉम्बिनेशन है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में इसका सॉल्यूशन सेंसरशिप नहीं, बल्कि सिटिजन वेरिफिकेशन कैपेसिटी को स्ट्रॉन्ग करना है। वायरल होना ट्रुथ का प्रूफ नहीं है। मैसेज फॉरवर्ड करने से पहले सोर्स, डेट, ओरिजिनल वीडियो और ऑफिशियल कम्युनिकेशन को चेक करना जरूरी है। यह वेरिफिकेशन बायस्ड नहीं होना चाहिए। अपनी पसंदीदा पार्टी या लीडर के फेवर में मौजूद खबर पर भी उसी प्रकार क्वेश्चन पूछे जाने चाहिए जैसे अपोजिशन के खिलाफ आने वाली खबर पर। 2027 में भारत के सात राज्यों में चुनाव होने हैं। देश को मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया के समन्वय से भारत विरोधी शक्तियों के विमर्श को एम्प्लिफाई कर अराजकता की ओर धकेलने के तमाम प्रयास प्रारम्भ हो चुके हैं। संवैधानिक संस्थाओं से लेकर सामाजिक समरसता तक सबको निशाने पर लिया जा रहा है।
ध्यान रहे भारत का लोकतंत्र केवल मतदान और चुनाव से सुरक्षित नहीं रहेगा। उसकी वास्तविक सुरक्षा उस नागरिक के विवेक में होगी जो राजनीतिक प्रचार और राजनीतिक सत्य के बीच अंतर कर सके। 2024 का नागपुर वाला “आरएसएस” प्रसंग हमें यही सिखाता है कि इनफार्मेशन वॉरफेयर के युग में सच्चा विडियो भी भ्रामक नैरेटिव का माध्यम बन सकता है, यदि पहचान और कॉन्टेक्स्ट को बदल दिया जाए। एआई इस चुनौती को और बड़ा कर रहा है। इसलिए लोकतंत्र की नई नागरिक संस्कृति का एक सरल नियम होना चाहिए, फर्स्ट वेरिफाई देन विलिव। पहले समझें, फिर शेयर करें। अपनी पसंद की पार्टी, अपने पसंदीदा नेता और अपने पसंदीदा नैरेटिव, तीनों के बारे में भी क्रिटिकल वेरिफिकेशन करें। क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसका वोट नहीं है; उसकी सबसे बड़ी शक्ति है कि उसका वोट उसके अपने विवेक से निकले, किसी मेनिपुलेटेड इनफार्मेशन इनवायरमेंट से नहीं।
